“बिहार की राजनीति में एक दौर ऐसा भी था जब कहा जाता था — बाकी नेता परिवार बनाते हैं, लेकिन नीतीश कुमार व्यवस्था बनाते हैं।
लेकिन जाते-जाते नीतीश कुमार ने अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी… अपनी ‘अलग छवि’… खुद ही खत्म कर दी।
जिस नेता को लोग परिवारवाद से दूर मानते थे, आज वही अपने बेटे को राजनीति और सत्ता में स्थापित करते नजर आए। और यहीं से वो सवाल खड़ा हुआ… क्या नीतीश कुमार भी आखिरकार उसी राजनीति का हिस्सा बन गए, जिसकी आलोचना वो वर्षों से करते रहे?
कभी लालू परिवार पर हमला… कभी वंशवाद के खिलाफ बयान… लेकिन अब जनता पूछ रही है — क्या सिद्धांत सिर्फ विरोधियों के लिए थे?
लेकिन कहानी सिर्फ परिवारवाद तक सीमित नहीं है।
अगर नीतीश कुमार के शासन की सबसे चर्चित नीति की बात करें, तो वो है शराबबंदी।
2016 में बड़े फैसले के तौर पर शराबबंदी लागू हुई। दावा किया गया कि बिहार बदल जाएगा, समाज सुधर जाएगा, महिलाएं सुरक्षित होंगी।
लेकिन जमीनी हकीकत क्या है?
आज बिहार का शायद ही कोई ऐसा इलाका हो जहां शराब की सप्लाई न होती हो। गांव से शहर तक, गली से मोहल्ले तक… शराब पहुंचती रही।
सवाल उठता है — अगर कानून इतना सख्त था, तो शराब का नेटवर्क इतना मजबूत कैसे हो गया?
लाखों लोगों पर केस हुए, जेलें भरी गईं, लेकिन शराब माफिया फलते-फूलते रहे।
यानि कार्रवाई आम लोगों पर ज्यादा दिखी… और सिस्टम असली नेटवर्क को रोकने में कमजोर साबित हुआ।
यही वजह है कि अब विरोधी ही नहीं, आम लोग भी कहने लगे हैं — नीतीश कुमार कागजों पर मजबूत दिखे, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर कई मोर्चों पर असफल रहे।
सड़क, बिजली और कानून व्यवस्था में शुरुआती सुधारों ने उन्हें सुशासन बाबू की पहचान दिलाई थी।
लेकिन समय के साथ वही सरकार नौकरशाही, भ्रष्टाचार और कमजोर फैसलों के आरोपों में घिरती चली गई।
और अब जब राजनीति के आखिरी पड़ाव पर उन्होंने परिवार को आगे बढ़ाने का संकेत दिया… तो उनकी वर्षों की बनाई हुई ‘अलग नेता’ वाली छवि भी सवालों के घेरे में आ गई।
क्योंकि जनता सिर्फ काम नहीं देखती… जनता चरित्र भी देखती है।
और बिहार की राजनीति में अब ये बहस तेज हो चुकी है —
क्या नीतीश कुमार सच में अलग थे…
या बस अलग दिखने में सफल रहे?”













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